Monday, August 31, 2026
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. डॉ भीमराव अंबेडकर और प्रबुद्ध भारत*

 

*डॉ. भीमराव अंबेडकर और प्रबुद्ध भारत*

भारत वर्ष सदैव से सभ्यता, संस्कृति, दर्शन आदि संदर्भों में विभन्नताओं का देश रहा है। अनेकों मनीषियों का जन्म भारत भूमि पर हुआ उन्हीं में से एक नाम जो विश्व शिक्षा के गगन में नक्षत्र की भांति प्रकाशमान है, वो नाम है डॉ. भीमराव अंबेडकर। जिनकी विश्व विख्यात छवि जो उनके दर्शन,गहन चिंतन, तार्किकता,मौलिकता,अर्थशास्त्र,धर्मशास्त्र,राजनीतिक चिंतन के कारण विद्यमान हुई।विश्व भर में ज्ञान प्रतीक रूप में अपनी विशिष्ट पहचान कायम करने वाले बाबा साहब डॉ भीमराव अंबेडकर ने अपनी वैचारिक शक्ति,बौद्धिकता के बल पर ये साबित कर दिया कि कोई भी मनुष्य अपने अपने द्वारा किए गए कार्यों ,दृढ़ संकल्प, स्वस्थ वैचारिकी, अतिव्यापक दृष्टिकोण से दुनियां को बदल सकता है। उनकी बौद्धिकता,तर्कशक्ति,विवेक, वैज्ञानिक सोच का लोहा समस्त संसार मानता है। भारतीय संविधान निर्माता डॉ. अंबेडकर जी ने मधकालीन संत कवियों के प्रबुद्ध भारत की परिकल्पना को प्रत्यक्ष रूप दिया। ताउम्र अभावपूर्ण, भेदभावपूर्ण, असमानता का व्यथित जीवन व्यतीत करने वाले बाबा साहब ने इस पग… पग पर अपमानित करने वाले जीवन दंश को झेला था किंतु कभी भी अपनी आत्मशक्ति को क्षीण नहीं होने दिया बल्कि उससे दोगुनी शक्ति संचारित की और अपने कर्तव्य पथ पर चलते रहे।बचपन से ही उनमें विलक्षण प्रतिभाएं विद्यमान थी। जब वे विद्यालय गए तभी से इस प्रकार की हीनभावना से ग्रसित समाज के कटाक्षों को वे झेलते रहे, बार बार वे समाज में अपने साथ होते दुर्व्यहार को लेकर सवाल उठाते उनकी तीक्ष्ण बुद्धि सामाजिक व्यवहार के अपनेप्रति भिन्न व्यवहार के कारण खोजने लगती। समाज के इस बर्ताव से वे अपनी आंतरिक क्षमताओं को बढ़ाते रहे। उस घोर निंदनीय व्यवस्था व्यवहार को खत्म करने का संकल्प वहीं से शुरू हो गया था।अपने गुरु से उन्होंने अपनी जिज्ञासा जताते हुए कहा…
“गुरु जी मैं सबकुछ सहूंगा,मुझे पढ़ लिखकर एक दिन नया कानून बनाना है। एक ऐसा कानून जो अछूत को समाज में ऊंचा स्थान दिलाएगा देख लेना,सरकार इस कानून को मानेगी।”
डॉ. भीमराव आंबेडकर ने एकाग्रचितता रखते हुए कठिन परिश्रम से पढ़ाई की।वो मुकाम भी हासिल किया जो एक इंसान पाने के बाद संतुष्ट होकर जीवनयापन करता है और सुख सुविधाएं जुटाने लगता है। लेकिन उनका तो निज हेतू कुछ था ही नहीं, देश हित, वंचित तबके को शोषण के दलदल से मुक्ति दिलाना उनका मूल उद्देश्य था।जब बाबा साहब ने उच्च शिक्षा हासिल कर सिडेन हाम कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स में नवंबर 1918में प्रोफ़ेसर पद पर कार्यरत थे,जहां बाबा साहब ने राजनीति और अर्थशास्त्र पढ़ाना प्रारंभ किया था।वहां भी जातीय दंभी लोगों ने उनकी भर्त्सना में कोई कसर नहीं छोड़ी। तब उन्होंने अनुभव किया कि वर्ण व्यवस्था ने जो जाति कलंक माथे पर मढ रखा है उसे उच्च शिक्षा से भी समाप्त कर पाना असंभव है,जब तक अधिकार हासिल न किए जाएं। वहां घटी आकस्मिक घड़े की घटना ने उनके समक्ष एक सत्य का रहस्योद्घाटन हुआ। स्थिति ने एक और सवाल पैदा कर दिया…
“यह आपने क्या किया? आपने घड़ा अपवित्र कर दिया,अब इसका पानी कोई नहीं पी सकता।”
इस घटना से उन्हें गहरा आघात पहुंचा,वे आहत मन से एकांत में बैठकर सोचने लगे…
“यह सब कोई नई बात नहीं है अम्बेडकर,यह तो वह अपमान गाथा है जो हर अछूत के जीवन का अभिन्न अंग है।पढ़…लिख जाने मात्र से समाज तुम्हें तुम्हारा अधिकार देने वाला नहीं। इसके लिए लंबी लड़ाई लड़नी होगी।लंबी और लगातार लड़ाई,बिना धैर्य खोए,बिना क्रोध किए। इस त्रासदी का मुकाबला करें और चाहे कुछ भी हो चाहे कुछ भी करना पड़े,अछूतों के जीवन के इस महाकलंक को धो डालो।मत भूलो कि तुम्हारी मां को छोटी सी बीमारी के कारण इसलिए मरना पड़ा कि कोई अच्छा वैद्य अछूत के घर आने को तैयार नहीं हुआ।पिता जब बीमार हुए तो ऊंची जाति के अफसर ने इसलिए छुट्टी देने से इंकार कर दिया कि तुम अछूत हो और नौकरी से इस्तीफा देकर ही तुम्हें पिता का इलाज़ कराने का अधिकार प्राप्त किया। पग.. पग पर संघर्ष करना है। बहुत कुछ खोना पड़ेगा,अपने आपको तिल…तिल मिटाना पड़ेगा, तब कहीं जाकर मंज़िल हाथ आएगी।”
बाबा साहब भीमराव आंबेडकर के सामने प्रतिदिन एक नई चुनौती खडी रहती थी,लेकिन उन्होंने कभी भी अपनी आत्मशक्ति, आत्मबल को क्षीण नहीं होने दिया। पर्वत की भांति अटल सीना ताने हर चुनौती स्वीकार कर उसे समाप्त करने का प्रण लेते। जो समाज अशिक्षा के कारण घोर सुतावस्था में था उनको चेताने के लिए बाबा साहब ने लोगों को एकत्रित कर संबोधित कर अपने हकों के लिए जागृति करने का बीड़ा उठा लिया। 13अक्टूबर 1935को बाम्बे प्रेसिडेंट में येओला में दमित वर्ग सम्मेलन में अम्बेडकर ने दस हज़ार श्रोताओं को बताया….
चूंकि हमारा दुर्भाग्य है कि हम स्वयं को हिंदू कहते हैं,इसलिए हमारे साथ ऐसा बर्ताव होता है।यदि किसी और धर्म को मानते तो हमारे साथ कोई ऐसा व्यवहार न करता। कोई भी ऐसा धर्म अपना लो जो तुम्हें गरिमा और बराबरी का दर्जा देता हो। हम अब अपनी गलती सुधरेंगे।यह मेरा दुर्भाग्य था,कि मैंने अछूत के कलंक के साथ जन्म लिया।हांलाकि,यह मेरी कोई गलती नहीं थी, लेकिन मैं हिंदू बना रहकर मरूंगा नहीं, क्यों कि यह मेरे वश में है।”
इस निर्णय से पूर्व भी जातीय शोषण की शिकार मेहनतकश जातियों ने शोषण से निजात पाने के लिए धर्म परिवर्तन किया था। किंतु बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर क्योंकि सुधारवादी और अपने समय के अछूतों के बड़े नेता होने के साथ ही सबसे शिक्षित व्यक्ति थे तो उनकी बात का असर उनके समकालीन नेताओं पर काफ़ी असरदार था।दमन से बचाव के लिए उन्होंने ये बड़ा फ़ैसला किया। जो किसी के लिए सहज,किसी के लिए धमकी, किसी के लिए जीवन परिवर्तन का मार्ग था। बाद मेंउन्होंने बौद्ध धर्म को अपने लाखों अनुयायियों के साथ अपनाया।अपने और अपने समाज के लोगों के जीवनातीत भोगे शोषण की दशा को देखकर ही उन्होंने ये निर्णय लिया था। बोधसत्व बाबा साहब ने अब खुली आंखों में ऐसे भारत के ख़्वाब को पाला जो खुशहाल हो, समानता लिए हो, जो शिक्षित, जागरूक, वैज्ञानिक हो, यौनिक भेद से परे हो,न्यायप्रिय हो। जो रूढ़िवादीता पर नहीं बौद्धिकता, लोकतंत्र पर टिका हो, सबको समान अधिकार देता हो….
“अम्बेडकर का आदर्शलोक बहुत यथार्थवादी और व्यवहारिक था,यह न्याय का नगर था,इंसाफ़ का शहर,सांसारिक न्याय। उन्होंने एक प्रबुद्ध भारत की परिकल्पना की, जिसमें बौद्ध विचारों के साथ…. साथ यूरोपीय ज्ञान के सर्वोत्तम विचारों को जोड़ा गया था। अपने जीवन के आख़िरी समाचार पत्र जो उन्होंने संपादित किए, अम्बेडकर ने उनका नामकरण भी प्रबुद्ध भारत नाम से किया था।”
भारत के प्रत्येक आर्थिक,सामाजिक रूप से दलित लोगों के लिए उन्होंने अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। इस देश की स्त्रियों के लिए अधिकार,आर्थिक व सामाजिक रूप से वंचित लोगों के लिए मूलभूत अधिकारों के लिए अनेकों आंदोलन कर सामाजिक चेतना जागृत करने कार्य किया।1920 का दशक एक निर्णायक दशक रहा जिसमें कुओं,तालाबों,विद्यालयों,सार्वजनिक स्थलों पर प्रयोग एवम आवागमन के अधिकार के प्रारंभ के रूप में माना गया। चिंतक बाबा साहब ने अपनी बात को लोगों तक पहुंचा ने हेतु अपनी प्रथम पत्रिका “मूक नायक” शुरू की। जिसके माध्यम से अधिक से अधिक लोगों तक विचाराधारा पहुंच सके। तत्पश्चात उन्होंने और भी पत्र… पत्रिकाएं प्रकाशित की। डॉ.अम्बेडकर अपने देश और समाज दोनों के लिए प्रतिबद्ध रहे। उनके द्वारा किए गए सभी संकल्प उन्होंने पूर्ण किए। उन्होनें कहा था…
“कि जहां मेरे व्यक्तिगत और देश हित में टकराव होगा वहां मैं देश के हित को प्राथमिकता दूंगा,लेकिन जहां दलित जातियों के हित में टकराव होगा, वहां मैं दलित जातियों को प्राथमिकता दूंगा।”
उन्होंने अपने इस वायदे को जीवनपर्यन्त निभाया तथा अछूतोद्धार के लिए जीवन भर संघर्षरत रहे।वे मानव हितैसी थे, जनकल्याण,जनअधिकार के लिए तत्पर थे।
“सन 1927 में डॉ.अम्बेडकर ने छुआछूत के खिलाफ़ एक व्यापक आंदोलन शुरु करने का फैसला किया,उन्होंने सार्वजनिक आंदोलनों और जुलूसों के द्वारा पेयजल के सार्वजनिक स्थानों को समाज के लिए खुलवाने के लिए संघर्ष किया,महाड़ के चावदार तालाब से दलितों को पानी लेने का हक दिलाने के लिए उन्होंने संघर्ष शुरु किया,उनका तर्क था कि जिस तालाब से जानवर भी पानी पी सकते हैं वहां से आख़िरकार दलितों को पानी पीने का हक क्यों नहीं है आखिरकार उन्होंने सन 1937में बम्बई उच्च न्यायालय में यह मुकद्दमा जीता जिसके बाद दलित समाज के लोगों को इस तालाब से पानी लेने का रास्ता साफ हुआ। इसी तरह से विरोध स्वरूप उन्होंने दलितों को हिन्दू मंदिरों में प्रवेश करने का अधिकार दिलाने के लिए भी संघर्ष किया। बाबा साहेब का कहना था कि मैं जानता हूं कि इन मंदिरों में जाने से दलितों को कुछ नहीं मिलेगा,लेकिन हमारा विरोध है कि आखिरकार इन मंदिरों में हम क्यों नहीं जा सकते? उन्होंने कालाराम मंदिर में जाने की लड़ाई लड़ी।”
सामाजिक न्याय के लिए संघर्षरत डॉ. अंबेडकर ने कभी भी अपने एकल सुख की कल्पना नहीं की, इसी कारणवश महामानव ने सदियों से चली आ रहे शोषित ढांचे को पलट दिया।इस असंभावित दुर्लभ कार्य को करने के लिए कितनी ही विरोधी शक्तियों का सामना किया। कितनी ही आत्मवेदना उन्होंने झेली। सामाजिक क्रान्ति प्रणेता ने जनमानस के जीवन की दशा और दिशा ही बदल दी।पूर्व के महापुरुषों के द्वारा शिक्षा के अभाव के दुष्परिणामों के विषय में अवगत करा ही दिया था…
जहां एक तरफ ज्योतिबा फूले शिक्षा के सामाजिक महत्त्व को समझाते हुए लिखते हैं “विद्या बिन मति गई, मति बिन निति गई,
नीति बिन गति गई, गति बिन धन गया, धन बिन शुद्र पतित हुए।”वहीं दूसरी तरफ़ बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर भी शिक्षित बनो; की धारणा पर चलते हुए शिक्षा के महत्व को स्थापित किया इसका अभिप्राय यह है कि दलित बहुजन समाज सामाजिक और आर्थिक रूप से मात्र इसलिए पिछड़े था,क्यों कि इस समाज में शिक्षा का घोर अभाव था।शिक्षा औरअम्बेडकरवाद का गहरा नाता है,क्यों कि अम्बेडकरवादी अवधारणा किसी धर्म,रंगभेद,जातिभेद,रूढ़िवादिता,अंधविश्वास,अज्ञानता आदि को किसी भी स्वरूप में स्वीकार नहीं करती है तथा शिक्षा के माध्यम से ही सामाजिक आर्थिक विकास की पथरीली राहों को की तालाश करती है।”
भक्तिकालीन संत कवियों ने भी अपने समय में ऐसे ही समाज कुरीति,भेद भावपूर्ण समाज के जातीयता के कारण हो अन्याय को देखते हुए।जनचेतना,समानता,समतामूलक समाज के नव निर्माण को अपने सृजन के माध्यम से बताया है। क्रांतिकारी संत काव्य धारा के कवियों ने जम कर अपने समय के आडंबरवादी लोगों का विरोध तो किया ही साथ ही कबीर, रैदास जैसे सामाजिक चेतना जागृत कवियों ने समाज में बहुजनों के सुखद, खुशहाल,समृद्ध समाज कल्याण की बात कही, उन्होंने अपने पदों के द्वारा अपने मनोभावों को व्यक्त किया।संत शिरोमणि रैदास समरसता की बात करते है। प्रेम, करुणा, सौहार्द, आपसी सद्भावना, संदेशपरक रचनाएं लिखते हुए कहते है…. “ऐसा चाहूं राज मैं जहां मिले सबन को अन्न, छोटे बड़े सब सम बसै, रैदास रहे प्रसन्न।।” संत कवियों ने जो पलकों में स्वप्न पाले उन्हें वैचारिक क्रांति प्रणेता,विश्व ज्ञान के प्रतीक डॉ. भीमराव अंबेडकर ने साकार कर दिखाया। देश में लोकतांत्रिक प्रणाली,स्त्रीउत्थान,समानाधिकार,समतामूलक,सरसता,शिक्षित और लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले प्रबुद्ध भारत की परिकल्पना को न केवल स्वप्न रूप में पाला अपितु उसे प्रत्यक्ष रूप प्रदान करने हेतु अपना अनमोल जीवन करोड़ों भारतवासियों के लिए समर्पित कर उसे पूर्णता प्रदान की। आज जो आधुनिक भारत जो 19वीं शताब्दी के पश्चात का परिवर्तित परिदृश्य वाला भारत है वह संविधान की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर आधारित है। बाबा साहब डॉ.भीमराव अंबेडकरजी केअंतिम पत्र का नाम भी प्रबुद्ध भारत था। भारत के हर नागरिक को सम्यकसूत्र में पिरोकर न्याय, शिक्षा, संपति के अधिकार दें,उनके हितों की रक्षा करना उनके कर्तव्यों की प्राथमिकता में सम्मिलित था। बोधिसत्व बाबा साहब ने स्त्री पुरुष,जाति संप्रदाय का भेद किए बिना सम्यक दृष्टिकोण अपना कर प्रबुद्ध भारत नव निर्माण।किया था।

 

लेखिका डॉ. राजकुमारी (सहायक प्रवक्ता)

दिल्ली 

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