उपाध्यक्ष के दावों और जमीनी हकीकत में कितना अंतर? जोन-8 में धड़ल्ले से निर्माण, अन्य जोनों में भी अवैध प्लॉटिंग पर उठे सवाल
गाजियाबाद। जनसागर टुडे।
गाजियाबाद विकास प्राधिकरण (जीडीए) के उपाध्यक्ष नंदकिशोर कलाल लगातार अवैध निर्माण और अवैध प्लॉटिंग पर अंकुश लगाने के दावे कर रहे हैं। इसके बावजूद लोनी, डीएलएफ कॉलोनी और शालीमार गार्डन सहित जोन-8 के विभिन्न क्षेत्रों में कथित अवैध निर्माणों को लेकर उठ रहे सवाल प्राधिकरण की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगा रहे हैं। सवाल यह है कि जब प्राधिकरण अवैध निर्माणों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर गंभीर है, तो फिर इन क्षेत्रों में निर्माण गतिविधियों पर प्रभावी रोक क्यों नहीं दिखाई दे रही है?
स्थानीय स्तर पर लगातार सामने आ रहे अवैध निर्माणों के आरोपों ने प्राधिकरण की निगरानी व्यवस्था और प्रवर्तन कार्रवाई की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि संबंधित क्षेत्रों में बिना स्वीकृत नक्शे या नियमों के विपरीत निर्माण हो रहे हैं, तो उनकी समय रहते पहचान कर कार्रवाई करना संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी है।
अब देखना यह है कि जीडीए उपाध्यक्ष नंदकिशोर कलाल इन क्षेत्रों में अवैध निर्माणों की शिकायतों पर क्या कदम उठाते हैं। क्या प्राधिकरण मौके पर जांच कराकर वास्तविक स्थिति सार्वजनिक करेगा, या अवैध निर्माणों के खिलाफ कार्रवाई के दावे फाइलों तक ही सीमित रहेंगे? लोनी, डीएलएफ कॉलोनी और शालीमार गार्डन के मामलों में प्रभावी कार्रवाई ही इन सवालों का जवाब दे सकेगी।
जोन-8 ही नहीं, अन्य जोनों में भी उठ रहे सवाल
अवैध निर्माण और प्लॉटिंग का मुद्दा केवल जोन-8 तक सीमित नहीं बताया जा रहा है। जोन-1, 2, 3, 4 और 5 में भी अवैध प्लॉटिंग एवं निर्माण की शिकायतें सामने आने की बात कही जा रही है। ऐसे में प्राधिकरण की कार्रवाई केवल दावों और औपचारिकताओं तक सीमित है या वास्तव में अवैध गतिविधियों पर अंकुश लगाया जा रहा है, इसकी निष्पक्ष समीक्षा जरूरी हो गई है।
सीलिंग और कार्रवाई के दावों की जमीनी जांच जरूरी
सबसे बड़ा सवाल उन निर्माणों को लेकर है, जिन पर प्राधिकरण की ओर से कार्रवाई या सीलिंग किए जाने के दावे किए जाते हैं। यदि किसी निर्माण पर कार्रवाई के बावजूद वहां काम जारी रहता है और भवन बनकर तैयार हो जाता है, तो यह प्रवर्तन व्यवस्था की प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल खड़े करता है। इसी तरह जिन स्थानों पर अवैध प्लॉटिंग की शिकायतें हैं, वहां समय रहते कार्रवाई नहीं होने पर पूरी जमीन प्लॉटों में तब्दील हो जाने का खतरा बना रहता है।
ऐसे मामलों में केवल नोटिस जारी करना या सीलिंग की कार्रवाई का दावा करना पर्याप्त नहीं है। यह भी सुनिश्चित करना जरूरी है कि संबंधित निर्माण वास्तव में बंद हुआ या नहीं, सील तोड़कर दोबारा निर्माण तो नहीं किया गया और नियमों के विपरीत विकसित की जा रही कॉलोनियों पर प्रभावी रोक लगी या नहीं।






